"स्वातंत्र्य वीर” विनायक दामोदर सावरकर 



"स्वातंत्र्य वीर” विनायक दामोदर सावरकर
"स्वातंत्र्य वीर” विनायक दामोदर सावरकर 



विनायक दामोदर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक में एक मराठी परिवार में हुआ था। 1901 में उन्होंने नासिक के शिवजी हाईस्कूल से मैट्रिक्स की परीक्षा पास की और 1901 में उनकी शादी यमुना बाई के साथ हुई, इस दौरान तमाम परेशानियों के बावजूद उन्होंने आगे पढाई जारी रखने का फैसला किया और पुणे के मशहूर Fergusan कॉलेज से स्नातक करने के बाद वह वकालत की पढ़ाई करने लंदन चले गए, लंदन में उनकी मुलाकात लाला हरदयाल से हुई जो उन दिनों लंदन में इंडिया हाउस की देख रेख करते थे। वे एक वकील, राजनीतिज्ञ, कवि, लेखक और नाट्यलेखक भी थे। सावकर कभी भी राष्ट्रीय सवयं सेवक संघ से नहीं जुड़े लेकिन उनका नाम संघ में बहुत इज्जत के साथ लिया जाता है, विनायक दामोदर सावरकर ने उस समय आज़ादी की आवाज उठायी थी जब भारत में बड़े-बड़े क्रन्तिकारी नहीं  थे, जब भारत में भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चंद्र बोस नहीं थे तब सावरकर ने आज़ादी की चिंगारी जलाई थी। सावरकर हिंदुत्व को बहुत ज़्यादा मह्रत्व देते थे, वे हमेसा से ही भारत को एक हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहते थे सावरकर की उम्र महज 9 साल थी जब उनकी माताजी का निधन हो गया, जिसके बाद पूरे परिवार की देख रेख उनके बड़े भाई गणेश सावरकर करते है, गणेश सावरकर भी बहुत बड़े क्रन्तिकारी थे। गणेश सावरकर मानते थे अगर अंग्रेजो को भारत से भागना है तो इनके खिलाफ आंदोलन छेड दो। सावरकर की माँ बचपन में उनको वीरता की कहानी सुनती थी। विनायक दामोदर सावरकर वह स्वतंत्रता सेनानी जिनके नेतृत्व में भारत को एक नया सम्मान प्राप्त हुआ, भारत की स्वतंत्रता संग्राम में उनकी बहादुरी और उनका संघर्ष और देश के लिए बलिदान, उनके भारत की स्वतंत्रता में सहयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ स्वतंत्रता सेनानियों में से एक बनाता है। 1904 में सावरकर ने अभिनव भारत संगठन की स्थापना की और आज़ादी की के बाद 1952 में अभिनव भारत भंग हो गया, आजादी के लिए काम करने के लिए उन्होंने एक गुप्त सोसायटी बनाई थी, जो 'मित्र मेला' के नाम से जानी गई। बाद में यह 'अभिनव भारत सोसाइटी' नामक संगठन में बदल गया। आजादी से पहले वे तीन अंग्रेज अधिकारियों की हत्या या इसकी कोशिश में शामिल थे। राष्ट्रवादियों के नजरिये से ये हत्याएँ हिंसक तौर-तरीकों से अंग्रेज़ी शासन को उखाड़ फेंकने की सावरकर की क्रांतिकारी भावना दिखाती हैं। एक जुलाई, 1909 में मदनलाल ढींगरा ने सर विलियम कर्जन वाइली की लंदन में गोली मारकर हत्या कर दी थी जिसमे सावरकर का नाम भी आया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई मजबूत सबूत नहीं थे। भारत माँ के इस वीर सपूत ने 26 फरवरी 1966 में अंतिम सांस ली



सावकर माने तेज, सावरकर माने तप, सावरकर माने तर्क, सावरकर माने तीर, सावरकर माने त्याग, सावरकर माने तलवार, सावरकर माने तीखापन
  अटल बिहारी वाजपेयी



अंडमान निकोबार की जेल में काला पानी की सजा


दामोदर सावरकर के हर कदम पर अंग्रेज़ो की पैनी नजर थी, अंग्रेज चाहते थे सावरकर कुछ ग़लत कदम उठाये और वह उनको जेल में डाले और कुछ ऐसा ही हुआ नासिक जिले के कलेक्टर जैकसन की हत्या के लिए नासिक षड्यंत्र कांड के आरोप में सावरकार को 7 अप्रैल, 1911 को काला पानी की सजा सुनाते हुए अंडमान द्वीप के सेल्युलर जेल भेज दिया गया, जहाँ कोर्ट से उन्हें 25-25 साल की दो अलग-अलग सजाएँ सुनाई गईं, उन्हें सेल्युलर जेल में 13.5 / 7.5 फीट की घनी अंधेरी कोठरी में रखा गया। इस जेल में कैदियों को कोल्हू में बैल की तरह जोत दिया जाता था। जब सावरकर सेक्युलर जेल में कैद अपनी कविताये कोयले से जेल की दीवारों पर लिखी जो आज भी वहाँ मौजूद है।











अंडमान द्वीप के सेल्युलर जेल 

अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर बनी सेल्युलर जेल आज भी काला पानी की दर्दनाक दास्तां सुनाती है। आज भले इसे राष्ट्रीय स्मारक में बदल दिया गया हो लेकिन बटुकेश्वर दत्त और वीर सावरकर जैसे अनेक सेनानियों की कहानी आज भी यह जेल सुनाती है। इस जेल को सेल्युलर इसलिए नाम दिया गया था, क्योंकि यहाँ एक कैदी से दूसरे से बिलकुल अलग रखा जाता था। जेल में हर कैदी के लिए एक अलग सेल होती थी। यहाँ का अकेलापन कैदी के लिए सबसे भयावह होता था। यहाँ कितने भारतीयों को फांसी की सजा दी गई और कितने मर गए इसका रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध खत्म होने के बाद 1945 में फिर अंग्रेजों ने यहाँ कब्जा जमाया। भारत को आजादी मिलने के बाद इसकी दो और शाखाओं को ध्वस्त कर दिया गया। शेष बची तीन शाखाएँ और मुख्य टावर को 1969 में राष्ट्रीय स्मारक घोषित कर दिया गया। 1963 में यहाँ गोविन्द वल्लभ पंत अस्पताल खोला गया। वर्तमान में यह 500 बिस्तरों वाला अस्पताल है। 


Connect with us - Patriotictech

Post a Comment

Previous Post Next Post