पृथ्वीराज चौहान  का  तराइन   के युद्ध   में  गौरी से  हारने  के बहुत कारण   थे  उनमे से  ही  कुछ  कारण जानते  है :-




इतिहास की किताबों में यह बताया जाता है कि जयचंद्र ने गौरी को हमले के लिए आमंत्रित किया था लेकिन वो ये बात नही बताती की जयचंद्र ने मदद की थी कि नही ।दूसरी बात की जयचंद से पहले से भी गौरी हमला कर ही रहा था ऐसे में जयचंद्र को ही दोषी ठहराने को बात उचित नहीं है।

● दूसरी बात यह है कि पृथ्वीराज के समर्थन में स्थानीय कई राजपूत राजा इस युद्ध मे शामिल हुए थे इसलिए यह कहना सही नही की पृथ्वीराज सब से लड़ाई कर रहा था।


● एक बात और है कि गौरी और पृथ्वीराज में लड़ाई का एक कारण अजमेर आ कर रह रहे मुइनुद्दीन चिश्ती भी थे जिनसे धर्मपरिवर्तन को लेकर पृथ्वीराज का टकराव था ।

● बाद में पृथ्वीराज की मौत के बाद गौरी और गुलाम वंश के शासकों के मुइनुद्दीन से अच्छे सबंध थे ।


इसके अलावा भी कारण थे हार के :-


● राजपूत राजाओं का दुश्मन को माफ करने की नीति एक गलत नीति थी । पृथ्वीराज ने ही गौरी को जिंदा ना छोड़ा होता तो समस्या बड़ी ना होती ।

● बाद के समय मे राणा सांगा ने 2 बार इब्राहिम लोदी को पकड़ा और कैद से जिंदा छोड़ दिया।

● यही गलती विजय नगर और मराठों ने निजामो के साथ की खुद को महान दिखाने की बीमारी थी आजकल इसको सेकुलररिज्म के नाम से जानते है


पृथ्वीराज चौहान का तराइन के युद्ध में गौरी से हारने का कारण क्या था  ?
पृथ्वीराज चौहान का तराइन के युद्ध में गौरी से हारने का कारण क्या था  ?



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लेकिन ऐसा नही था कि सभी राजपूतों ने ये गलती की महाकाल भक्त बप्पा रावल ने ऐसा नही किया जब उन्होंने खलीफा के हमलों के बदले सिंध को बचाने के व महिलाओं के सम्मान लिए युद्ध लड़ा और उस लड़ाई के डर से मुस्लिम आक्रांता लंबे समय तक भारत की तरफ नही आये।


कुछ महत्वपूर्ण कारणों में एक कारण घोड़े की आपूर्ति की समस्या भी थी । :-


पृथ्वीराज तो मात्र एक पात्र थे , दरअसल पृथ्वीराज की जगह कोई भी होता तो हारता ही क्योंकि इसकी नीव 200 वर्ष पहले ही रखी जा चुकी थी, जब हिंदुस्तान के हाथ से कंधार चला गया 

जब सुबुक्तगीन ने जयपाल को कंधार में हराया तब ही यह तय हो गया था कि अब भारत को भारी हिंसा झेलना होगा, आप पूरे इतिहास को ठीक से पढ़िए, उस काल मे जिसका भी अधिकार इस इलाके पर रहा उसने ही भारत पर राज किया, चाहे वो तुर्की हो या फिर पठान, मंगोल हो या फिर अब्दाली या सिख धर्म के महाराजा रणजीत सिंह हो। बाद में इस बात को समझ अंग्रेज़ो ने आफगानिस्तान में लंबी लड़ाई लड़ी । इस क्षेत्रों में जब सिखों की ताकत बढ़ी तभी मुग़लों का राज कमजोर होने लगा।

कंधार ना सिर्फ भारत का प्रवेश द्वारा था बल्कि घोड़ो की आपूर्ति भी यहीं से होते थी  और यह क्षेत्र अपने बहादुर योद्धाओं के लिए भी प्रसिद्ध था, जब मुग़लो के हाथ से यह क्षेत्र निकल गया तो मुगल साम्राज्य भी ज्यादा टिक नहीं पाया, अब्दाली और नादिरशाह के हमले उसकी ही परिणति थी ।

शुरुआत में मुगल इस क्षेत्र पर कब्जे को लेकर गंभीर रहते थे लेकिन समय के साथ उन्होंने जब उन्होंने अपना विस्तार दक्कन और पूर्वी भारत मे करना शुरू किया तो वो ,कंधार को लेकर लापरवाह हो गए और ये क्षत्र उनके कब्जे से जाते ही भारत से उनकी जड़े उखड़ गए।

घोड़े की आपूर्ति के लिए विजय नगर वाले पुर्तगाली लोगो से करते थे।

सीमांत प्रदेशो की सुरक्षा किसी भी देश के लिए सबसे जरूरी होती है । कंधार का हिंदूओ के हाथ से निकलना ही एकमात्र कारण था यही गलती नेहरू ने चीन के मामले की जब उन्होंने तिब्बत पर चीन के कब्जे का ठीक से विरोध नही किया और तिब्बत को चीन का हिस्सा स्वीकार कर लिया । उसका परिणाम यह हुआ कि बाद में चीन ने हमारी जमीन पर कब्जा कर लिया।





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